Vidhi 6 सिद्धिदात्री

माँ चन्द्रघण्टा पूजा विधि | Maa Chandraghanta Puja Vidhi

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माँ चन्द्रघण्टा पूजा विधि | Maa Chandraghanta Puja Vidhi

माँ चन्द्रघण्टा पूजा विधि | Devi Chandraghanta Puja Vidhi

॥ नवरात्रि के तीसरे दिन (माँ चन्द्रघण्टा पूजा विधि) ॥

तीसरे दिन माँ चन्द्रघण्टा पूजा-उपासना की आराधना की जाती है । माँ चन्द्रघण्टा को दूध या दूध से बनी मिठाई जैसे - खीर या बर्फी का भोग लगा सकते हैं ।

॥ स्नान और वस्त्र धारण: ॥

ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें.

॥ स्थान की शुद्धि: ॥

पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें.

॥ संकल्प: ॥

देवी से मनोकामना पूर्ति के लिए संकल्प लें.

॥ मूर्ति स्थापना: ॥

मां चंद्रघंटा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें.

॥ गंगाजल स्नान: ॥

मां की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराएं.

॥ सामग्री अर्पित करें: ॥

रोली, चंदन, अक्षत, सिंदूर, धूप, दीप, पुष्प और इत्र अर्पित करें.

॥ भोग लगाएं: ॥

मां को खीर, दूध से बनी मिठाई या शहद का भोग लगाएं.

॥ मंत्र जप: ॥

मां चंद्रघंटा के मंत्रों का जाप करें.

॥ दुर्गा चालीसा/आरती: ॥

दुर्गा चालीसा का पाठ करें और मां चंद्रघंटा की आरती गाएं.

॥ प्रसाद वितरण: ॥

पूजा के बाद प्रसाद परिवारजनों और कन्याओं में वितरित करें.

॥ विवरण ॥

देवी पार्वती के विवाहित स्वरूप को देवी चन्द्रघण्टा के रूप में जाना जाता है । भगवान शिव से विवाह होने के पश्चात् देवी महागौरी ने अपने मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करना आरम्भ कर दिया, जिसके कारण देवी पार्वती को देवी चन्द्रघण्टा के नाम से जाना जाने लगा । मान्यताओं के अनुसार, देवी चन्द्रघण्टा शुक्र ग्रह को शासित करती हैं । देवी चन्द्रघण्टा बाघिन की सवारी करती हैं । देवी चन्द्रघण्टा को दस भुजाओं के साथ दर्शाया गया है । देवी चन्द्रघण्टा अपने चार बायें हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार तथा कमण्डलु धारण करती हैं तथा पाँचवाँ बायाँ हाथ वर मुद्रा में रखती हैं । वह अपने चार दाहिने हाथों में कमल पुष्प, तीर, धनुष तथा जप माला धारण करती हैं तथा पाँचवें दाहिने हाथ को अभय मुद्रा में रखती हैं । देवी पार्वती का यह रूप शान्तिपूर्ण एवं अपने भक्तों का कल्याण करने वाला है । मान्यतानुसार, उनके मस्तक पर विद्यमान चन्द्र-घण्टी की ध्वनि उनके भक्तों की समस्त प्रकार की शक्तियों से रक्षा करती हैं ।

॥ प्रिय पुष्प ॥

चमेली ॥

॥ मन्त्र ॥

ॐ देवी चन्द्रघंटायै नमः ॥

॥ मंत्र ॥

या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।।

॥ मुख्य बीज मंत्र ॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघण्टायै नम: ॥

॥ प्रार्थना ॥

पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता ।
प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥

॥ स्तुति ॥

या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

॥ ध्यानम् ॥

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
सिंहारूढा चन्द्रघण्टा यशस्विनीम् ॥

मणिपुर स्थिताम् तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम् ।
खङ्ग, गदा, त्रिशूल, चापशर, पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम् ॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम् ।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम ॥

प्रफुल्ल वन्दना बिबाधारा कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम् ।
कमनीयां लावण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम् ॥

॥ स्तोत्रम् ॥

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम् ।
अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम् ॥

चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टम् मन्त्र स्वरूपिणीम् ।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम् ॥

नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायिनीम् ।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम् ॥

॥ कवचम् ॥

रहस्यम् शृणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने ।
श्री चन्द्रघण्टास्य कवचम् सर्वसिद्धिदायकम् ॥

बिना न्यासम् बिना विनियोगम् बिना शापोध्दा बिना होमम् ।
स्नानम् शौचादि नास्ति श्रद्धामात्रेण सिद्धिदाम ॥

कुशिष्याम् कुटिलाय वञ्चकाय निन्दकाय च ।
न दातव्यम् न दातव्यम् न दातव्यम् कदाचितम् ॥

॥ आरती ॥

जय माँ चन्द्रघण्टा सुख धाम । पूर्ण कीजो मेरे काम ॥
चन्द्र समाज तू शीतल दाती । चन्द्र तेज किरणों में समाती ॥

मन की मालक मन भाती हो । चन्द्रघण्टा तुम वर दाती हो ॥
सुन्दर भाव को लाने वाली । हर संकट में बचाने वाली ॥

हर बुधवार को तुझे ध्याये । सन्मुख घी की ज्योत जलाये ॥
श्रद्दा सहित तो विनय सुनाये । मूर्ति चन्द्र आकार बनाये ॥

शीश झुका कहे मन की बाता । पूर्ण आस करो जगत दाता ॥
काँचीपुर स्थान तुम्हारा । कर्नाटिका में मान तुम्हारा ॥

नाम तेरा रटूँ महारानी । भक्त की रक्षा करो भवानी ॥

देवी सिद्धिदात्री की पूजा नवरात्रि के नौवें दिन की जाती है, जबकि चंद्रघंटा की पूजा तीसरे दिन की जाती है। दोनों की पूजा विधि में स्नान, स्वच्छ वस्त्र धारण करना, कलश स्थापना (यदि पहले नहीं की गई है), देवी को सिंदूर, अक्षत, पुष्प, फल और दूध से बने भोग लगाना, मंत्र जाप, और दुर्गा चालीसा व आरती पढ़ना शामिल है। मां चंद्रघंटा की पूजा विधि (तीसरा दिन) स्नान और वस्त्र: सुबह स्नान करके साफ वस्त्र पहनें। कलश स्थापना: यदि नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना नहीं हुई है, तो इस दिन देवी की चौकी पर कलश स्थापित करें। पूजा सामग्री: मां चंद्रघंटा को लाल और पीले फूल, अक्षत, सिंदूर, चंदन, धूप और दीप अर्पित करें। भोग और वस्त्र: उन्हें दूध से बनी मिठाई जैसे खीर का भोग लगाएं। मां को भूरे या सुनहरे रंग के वस्त्र पहनाना भी शुभ माना जाता है। मंत्र जाप और पाठ: मां चंद्रघंटा के मंत्रों का जाप करें, जैसे: या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:॥ ॐ देवी चन्द्रघंटायै नमः॥ आरती: मां दुर्गा की आरती करें। प्रसाद: भोग में लगाए गए फल और प्रसाद का वितरण करें। मां सिद्धिदात्री की पूजा विधि (नौवां दिन) स्नान: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। ध्यान और भोग: मां सिद्धिदात्री का ध्यान करें और उन्हें लाल या गुलाबी फूल, अक्षत, रोली, चंदन, और धूप-दीप अर्पित करें। नारियल और मिठाई: पूजा के अंत में नारियल और दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं। मंत्र जाप और पाठ: दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और मां के मंत्रों का जाप करें। प्रसाद वितरण: प्रसाद को परिवार के सदस्यों और कन्याओं में बांटें। सामान्य सुझाव मां चंद्रघंटा की पूजा में पीले रंग के फूलों और वस्त्रों का प्रयोग करें। माँ चंद्रघंटा को खुश करने के लिए उन्हें दूध और खीर का भोग लगाएं, और शहद अर्पित करना भी शुभ माना जाता है। मां को प्रसन्न करने और सुख-शांति के लिए पूजा के बाद परिवार के सदस्यों में प्रसाद बांटें। उत्पत्ति सृष्टि के आरम्भ में भगवान रुद्र ने सृजन के उद्देश्य से आदि-पराशक्ति की आराधना की थी। मान्यताओं के अनुसार, देवी आदि-पराशक्ति का कोई निश्चित रूप अथवा आकर नहीं था। आदि-पराशक्ति, जो शक्ति की सर्वोच्च देवी हैं, भगवान शिव के वाम अङ्ग से सिद्धिदात्री के रूप में प्रकट हुयी हैं। नवरात्रि पूजा नवरात्रि के नौवें दिन देवी सिद्धिदात्री की पूजा-आराधना की जाती है। शासनाधीन ग्रह मान्यताओं के अनुसार, देवी सिद्धिदात्री केतु ग्रह को दिशा एवं ऊर्जा प्रदान करती हैं। अतः केतु ग्रह देवी सिद्धिदात्री द्वारा शासित होता है। स्वरूप वर्णन देवी सिद्धिदात्री कमल पुष्प पर विराजमान हैं तथा वह सिंह की सवारी करती हैं। देवी माँ को चतुर्भुज रूप में दर्शाया गया है। उनके एक दाहिने हाथ में गदा, दूसरे दाहिने हाथ में चक्र, एक बायें हाथ में कमल पुष्प तथा दूसरे बायें हाथ में शंख सुशोभित है। विवरण माता सिद्धिदात्री अपने भक्तों को समस्त प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। भगवान शिव को भी देवी सिद्धिदात्री की कृपा से ही सभी सिद्धियाँ प्राप्त हुयी थीं। उनकी पूजा मात्र मनुष्य ही नहीं अपितु देव, गन्धर्व, असुर, यक्ष एवं सिद्ध भी करते हैं। भगवान भोलेनाथ के वाम अँग से देवी सिद्धिदात्री के प्रकट होने के पश्चात् ही भगवान शिव को अर्ध-नारीश्वर की उपाधि प्राप्त हुयी थी। प्रिय पुष्प रात की रानी मन्त्र ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥ प्रार्थना सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥ स्तुति या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ध्यान वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्। कमलस्थिताम् चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्विनीम्॥ स्वर्णवर्णा निर्वाणचक्र स्थिताम् नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्। शङ्ख, चक्र, गदा, पद्मधरां सिद्धीदात्री भजेम्॥ पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्। मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥ प्रफुल्ल वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोला पीन पयोधराम्। कमनीयां लावण्यां श्रीणकटिं निम्ननाभि नितम्बनीम्॥ स्तोत्र कञ्चनाभा शङ्खचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो। स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥ पटाम्बर परिधानां नानालङ्कार भूषिताम्। नलिस्थिताम् नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोऽस्तुते॥ परमानन्दमयी देवी परब्रह्म परमात्मा। परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥ विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता। विश्व वार्चिता, विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥ भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी। भवसागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥ धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनीं। मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥ कवच ॐकारः पातु शीर्षो माँ, ऐं बीजम् माँ हृदयो। हीं बीजम् सदापातु नभो गृहो च पादयो॥ ललाट कर्णो श्रीं बीजम् पातु क्लीं बीजम् माँ नेत्रम् घ्राणो। कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै माँ सर्ववदनो॥ आरती जय सिद्धिदात्री माँ तू सिद्धि की दाता। तु भक्तों की रक्षक तू दासों की माता॥ तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि। तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि॥ कठिन काम सिद्ध करती हो तुम। जभी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम॥ तेरी पूजा में तो ना कोई विधि है। तू जगदम्बें दाती तू सर्व सिद्धि है॥ रविवार को तेरा सुमिरन करे जो। तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो॥ तू सब काज उसके करती है पूरे। कभी काम उसके रहे ना अधूरे॥ तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया। रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया॥ सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्यशाली। जो है तेरे दर का ही अम्बें सवाली॥ हिमाचल है पर्वत जहाँ वास तेरा। महा नन्दा मन्दिर में है वास तेरा॥ मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता। भक्ति है सवाली तू जिसकी दाता॥

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