Vidhi 5 महागौरी

माँ चन्द्रघण्टा पूजा विधि | Maa Chandraghanta Puja Vidhi

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माँ चन्द्रघण्टा पूजा विधि | Maa Chandraghanta Puja Vidhi

माँ चन्द्रघण्टा पूजा विधि | Devi Chandraghanta Puja Vidhi

॥ नवरात्रि के तीसरे दिन (माँ चन्द्रघण्टा पूजा विधि) ॥

तीसरे दिन माँ चन्द्रघण्टा पूजा-उपासना की आराधना की जाती है । माँ चन्द्रघण्टा को दूध या दूध से बनी मिठाई जैसे - खीर या बर्फी का भोग लगा सकते हैं ।

॥ स्नान और वस्त्र धारण: ॥

ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें.

॥ स्थान की शुद्धि: ॥

पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें.

॥ संकल्प: ॥

देवी से मनोकामना पूर्ति के लिए संकल्प लें.

॥ मूर्ति स्थापना: ॥

मां चंद्रघंटा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें.

॥ गंगाजल स्नान: ॥

मां की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराएं.

॥ सामग्री अर्पित करें: ॥

रोली, चंदन, अक्षत, सिंदूर, धूप, दीप, पुष्प और इत्र अर्पित करें.

॥ भोग लगाएं: ॥

मां को खीर, दूध से बनी मिठाई या शहद का भोग लगाएं.

॥ मंत्र जप: ॥

मां चंद्रघंटा के मंत्रों का जाप करें.

॥ दुर्गा चालीसा/आरती: ॥

दुर्गा चालीसा का पाठ करें और मां चंद्रघंटा की आरती गाएं.

॥ प्रसाद वितरण: ॥

पूजा के बाद प्रसाद परिवारजनों और कन्याओं में वितरित करें.

॥ विवरण ॥

देवी पार्वती के विवाहित स्वरूप को देवी चन्द्रघण्टा के रूप में जाना जाता है । भगवान शिव से विवाह होने के पश्चात् देवी महागौरी ने अपने मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करना आरम्भ कर दिया, जिसके कारण देवी पार्वती को देवी चन्द्रघण्टा के नाम से जाना जाने लगा । मान्यताओं के अनुसार, देवी चन्द्रघण्टा शुक्र ग्रह को शासित करती हैं । देवी चन्द्रघण्टा बाघिन की सवारी करती हैं । देवी चन्द्रघण्टा को दस भुजाओं के साथ दर्शाया गया है । देवी चन्द्रघण्टा अपने चार बायें हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार तथा कमण्डलु धारण करती हैं तथा पाँचवाँ बायाँ हाथ वर मुद्रा में रखती हैं । वह अपने चार दाहिने हाथों में कमल पुष्प, तीर, धनुष तथा जप माला धारण करती हैं तथा पाँचवें दाहिने हाथ को अभय मुद्रा में रखती हैं । देवी पार्वती का यह रूप शान्तिपूर्ण एवं अपने भक्तों का कल्याण करने वाला है । मान्यतानुसार, उनके मस्तक पर विद्यमान चन्द्र-घण्टी की ध्वनि उनके भक्तों की समस्त प्रकार की शक्तियों से रक्षा करती हैं ।

॥ प्रिय पुष्प ॥

चमेली ॥

॥ मन्त्र ॥

ॐ देवी चन्द्रघंटायै नमः ॥

॥ मंत्र ॥

या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।।

॥ मुख्य बीज मंत्र ॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघण्टायै नम: ॥

॥ प्रार्थना ॥

पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता ।
प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥

॥ स्तुति ॥

या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

॥ ध्यानम् ॥

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
सिंहारूढा चन्द्रघण्टा यशस्विनीम् ॥

मणिपुर स्थिताम् तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम् ।
खङ्ग, गदा, त्रिशूल, चापशर, पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम् ॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम् ।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम ॥

प्रफुल्ल वन्दना बिबाधारा कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम् ।
कमनीयां लावण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम् ॥

॥ स्तोत्रम् ॥

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम् ।
अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम् ॥

चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टम् मन्त्र स्वरूपिणीम् ।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम् ॥

नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायिनीम् ।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम् ॥

॥ कवचम् ॥

रहस्यम् शृणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने ।
श्री चन्द्रघण्टास्य कवचम् सर्वसिद्धिदायकम् ॥

बिना न्यासम् बिना विनियोगम् बिना शापोध्दा बिना होमम् ।
स्नानम् शौचादि नास्ति श्रद्धामात्रेण सिद्धिदाम ॥

कुशिष्याम् कुटिलाय वञ्चकाय निन्दकाय च ।
न दातव्यम् न दातव्यम् न दातव्यम् कदाचितम् ॥

॥ आरती ॥

जय माँ चन्द्रघण्टा सुख धाम । पूर्ण कीजो मेरे काम ॥
चन्द्र समाज तू शीतल दाती । चन्द्र तेज किरणों में समाती ॥

मन की मालक मन भाती हो । चन्द्रघण्टा तुम वर दाती हो ॥
सुन्दर भाव को लाने वाली । हर संकट में बचाने वाली ॥

हर बुधवार को तुझे ध्याये । सन्मुख घी की ज्योत जलाये ॥
श्रद्दा सहित तो विनय सुनाये । मूर्ति चन्द्र आकार बनाये ॥

शीश झुका कहे मन की बाता । पूर्ण आस करो जगत दाता ॥
काँचीपुर स्थान तुम्हारा । कर्नाटिका में मान तुम्हारा ॥

नाम तेरा रटूँ महारानी । भक्त की रक्षा करो भवानी ॥

नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। पूजा के लिए स्नान कर साफ वस्त्र पहनें, मां की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराएं, फिर रोली, चंदन, अक्षत, धूप और पीत वस्त्र अर्पित करें। मां को सफेद फूलों का श्रृंगार करें और सफेद मिष्ठान का भोग लगाएं। अंत में, "या देवी सर्वभूतेषु मां गौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।" मंत्र का जाप करें, आरती गाएं और प्रसाद बांटें। मां महागौरी पूजा विधि पवित्रता: सुबह उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें। शुद्धिकरण: पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। प्रतिमा स्थापना: मां महागौरी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। अभिषेक: मां की प्रतिमा को गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान कराएं। श्रृंगार और भोग: मां को सफेद वस्त्र, सफेद फूल, रोली, चंदन, कुमकुम और अक्षत अर्पित करें। सफेद मिष्ठान और पंचमेवा का भोग लगाएं। मंत्र जाप: मां महागौरी के मंत्रों का जाप करें। आरती और प्रसाद: मां की आरती गाएं और प्रसाद परिवार के सदस्यों के बीच बांटें। कन्या पूजन: अष्टमी के दिन नौ कन्याओं को देवी का रूप मानकर उनकी पूजा करें, उन्हें भोजन कराएं और उपहार देकर विदा करें। मां महागौरी पूजा मंत्र मुख्य मंत्र: या देवी सर्वभूतेषु मां गौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ अन्य मंत्र: श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बराधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥ भोग और अन्य भोग सामग्री भोग: सफेद मिष्ठान, पंचमेवा और फल का भोग लगाएं। अन्य सामग्री: रोली, चंदन, अक्षत, धूप, पीले फूल, और घी का दीपक जलाएं। उत्पत्ति हिन्दु पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी शैलपुत्री सोलह वर्ष की आयु में अत्यन्त रूपवती थीं तथा उनका वर्ण अत्यधिक श्वेत एवं धवल था। उनके अत्यधिक गौर वर्ण के कारण उन्हें देवी महागौरी के नाम से जाना जाने लगा। नवरात्रि पूजा नवरात्रि उत्सव के अष्टम दिवस के अवसर पर देवी महागौरी की पूजा-अर्चना की जाती है। शासनाधीन ग्रह मान्यताओं के अनुसार, राहु ग्रह को देवी महागौरी शासित करती हैं। स्वरूप वर्णन देवी महागौरी एवं देवी शैलपुत्री दोनों का वाहन बैल है तथा इसी कारण से उन्हें वृषारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है। देवी महागौरी को चतुर्भुज रूप में दर्शाया गया है। वह अपने एक दाहिने हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं तथा दूसरे दाहिने हाथ को अभय मुद्रा में रखती हैं। वह एक बायें हाथ में डमरू धारण करती हैं तथा दूसरे बायें हाथ को वर मुद्रा में रखती हैं। विवरण अपने नाम के ही अनुसार, देवी महागौरी अत्यन्त गौर वर्ण वाली हैं। देवी महागौरी के गौर वर्ण के कारण उनकी तुलना शंख, चन्द्रमा तथा कुन्द के श्वेत पुष्प द्वारा की जाती है। वह मात्र श्वेत वस्त्र धारण करती हैं तथा इसी कारण उन्हें श्वेताम्बरधरा के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। प्रिय पुष्प रात की रानी मन्त्र ॐ देवी महागौर्यै नमः॥ प्रार्थना श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥ स्तुति या देवी सर्वभूतेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ध्यान वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्। सिंहारूढा चतुर्भुजा महागौरी यशस्विनीम्॥ पूर्णन्दु निभाम् गौरी सोमचक्रस्थिताम् अष्टमम् महागौरी त्रिनेत्राम्। वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥ पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्। मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥ प्रफुल्ल वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् त्रैलोक्य मोहनम्। कमनीयां लावण्यां मृणालां चन्दन गन्धलिप्ताम्॥ स्तोत्र सर्वसङ्कट हन्त्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्। ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥ सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदायनीम्। डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाम्यहम्॥ त्रैलोक्यमङ्गल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्। वददम् चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥ कवच ॐकारः पातु शीर्षो माँ, हीं बीजम् माँ, हृदयो। क्लीं बीजम् सदापातु नभो गृहो च पादयो॥ ललाटम् कर्णो हुं बीजम् पातु महागौरी माँ नेत्रम् घ्राणो। कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा माँ सर्ववदनो॥ आरती जय महागौरी जगत की माया। जय उमा भवानी जय महामाया॥ हरिद्वार कनखल के पासा। महागौरी तेरा वहा निवासा॥ चन्द्रकली और ममता अम्बे। जय शक्ति जय जय माँ जगदम्बे॥ भीमा देवी विमला माता। कौशिक देवी जग विख्यता॥ हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा। महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा॥ सती (सत) हवन कुण्ड में था जलाया। उसी धुयें ने रूप काली बनाया॥ बना धर्म सिंह जो सवारी में आया। तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया॥ तभी माँ ने महागौरी नाम पाया। शरण आने वाले का संकट मिटाया॥ शनिवार को तेरी पूजा जो करता। माँ बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता॥ भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो। महागौरी माँ तेरी हरदम ही जय हो॥

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