Vidhi 1 देवी कात्यायनी

The Nine Forms of Maa Durga and Their Traditional Bhog 1. Shailaputri: The "Daughter of the Mountain," worshipped on the first day. Bhog: Desi Ghee. 2. Brahmacharini: The form embodying devotion and austerity. Bhog: Sugar. 3. Chandraghanta: The married form of Maa Parvati, a destroyer of demons. Bhog: Kheer (rice pudding). 4. Kushmanda: Known for her radiant glow that dispels darkness, associated with the cosmic egg. Bhog: Malpua (a sweet flatbread). 5. Skandamata: The mother of Lord Skanda (Kartikeya). Bhog: Bananas. 6. Katyayani: The fierce form who destroyed the demon Mahishasura. Bhog: Honey. 7. Kalaratri: The most ferocious and terrifying form of Maa Durga. Bhog: Jaggery. 8. Mahagauri: The epitome of purity, peace, and beauty. Bhog: Coconut. 9. Siddhidatri: The Goddess of all supernatural powers and accomplishments, worshipped on the final day. Bhog: Sesame seeds (til).

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शैलपुत्री पुजा विधी ॥ | Maa Shailaputri Puja Vidhi ॥

Ganesha_Aarti

॥ नवरात्रि का पहला दिन (मां शैलपुत्री) ॥

नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इन्हें गाय के घी से बने व्यंजन अर्पित करना शुभ माना जाता है। आप मां को शुद्ध घी, घी और चीनी से बनी पंजीरी या ऋतु फल अर्पित कर सकते हैं।

॥ विवरण ॥

देवी सती के रूप में आत्मदाह करने के उपरान्त, देवी पार्वती ने पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। संस्कृत में शैल का अर्थ पर्वत होता है, जिसके कारण देवी को पर्वत की पुत्री, अर्थात शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है । आदि शक्ति के इस शैलपुत्री रूप की पूजा करने से चन्द्र ग्रह से सम्बन्धित समस्त नकारात्मक प्रभावों से रक्षा की जा सकती है । देवी शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शिव के साथ हुआ था ।

॥ प्रिय पुष्प ॥

चमेली ॥

॥ मन्त्र ॥

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः ॥


॥ बीज मंत्र ॥

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः ॥

॥ प्रार्थना ॥

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥

॥ स्तुति ॥

या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

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॥ ध्यानम् ॥

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥


पूणेन्दु निभाम् गौरी मूलाधार स्थिताम् प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम् ।

पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता ॥


प्रफुल्ल वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम् ।

कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम् ॥

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॥ स्तोत्रम् ॥

प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागरः तारणीम् ।

धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाम्यहम् ॥


त्रिलोजननी त्वंहि परमानन्द प्रदीयमान् ।

सौभाग्यरोग्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाम्यहम् ॥


चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह विनाशिनीं ।

मुक्ति भुक्ति दायिनीं शैलपुत्री प्रणमाम्यहम् ॥

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॥ कवचम् ॥

ॐकारः में शिरः पातु मूलाधार निवासिनी ।

हींकारः पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी ॥


श्रींकार पातु वदने लावण्या महेश्वरी ।

हुंकार पातु हृदयम् तारिणी शक्ति स्वघृत ।

फट्कार पातु सर्वाङ्गे सर्व सिद्धि फलप्रदा ॥

॥ आरती ॥

शैलपुत्री माँ बैल असवार । करें देवता जय जय कार ॥

शिव-शंकर की प्रिय भवानी । तेरी महिमा किसी ने न जानी ॥


पार्वती तू उमा कहलावें । जो तुझे सुमिरे सो सुख पावें ॥

रिद्धि सिद्धि प्रदान करे तू । दया करें धनवान करें तू ॥


सोमवार को शिव संग प्यारी । आरती जिसने तेरी उतारी ॥

उसकी सगरी आस पुजा दो । सगरे दुःख तकलीफ मिटा दो ॥


घी का सुन्दर दीप जला के । गोला गरी का भोग लगा के ॥

श्रद्धा भाव से मन्त्र जपायें । प्रेम सहित फिर शीश झुकायें ॥


जय गिरराज किशोरी अम्बे । शिव मुख चन्द्र चकोरी अम्बे ॥

मनोकामना पूर्ण कर दो । चमन सदा सुख सम्पत्ति भर दो ॥

देवी कात्यायनी और चंद्रघंटा दोनों के लिए पूजा विधि एक समान है। पूजा के लिए सबसे पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें, फिर देवी की प्रतिमा स्थापित कर गंगाजल से शुद्ध करें। कलश स्थापना के बाद देवी मां को अक्षत, रोली, चंदन, फूल और चुनरी चढ़ाएं। उन्हें धूप-दीप दिखाएं, मंत्र जपें और भोग में शहद, दूध से बनी मिठाई और खीर अर्पित करें। अंत में दुर्गा चालीसा या आरती करें और प्रसाद वितरण करें। पूजा विधि स्नानादि और वस्त्र: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें. आसन और संकल्प: पूजा के लिए आसन पर बैठें और पूजन का संकल्प लें. प्रतिमा स्थापना: देवी कात्यायनी या चंद्रघंटा की प्रतिमा या फोटो चौकी पर स्थापित करें. शुद्धिकरण: प्रतिमा या चित्र को गंगाजल से शुद्ध करें. कलश स्थापना: कलश में जल भर कर चौकी पर रखें और कलश के ऊपर नारियल रखें. पूजा सामग्री: देवी को अक्षत, लाल चंदन, चुनरी, लाल पीले फूल अर्पित करें. धूप-दीप: देवी को धूप और दीप दिखाएं. भोग: उन्हें शहद, दूध से बनी मिठाई, खीर और मीठा फल अर्पित करें. पाठ और मंत्र: दुर्गा चालीसा का पाठ करें और देवी के मंत्रों का जाप करें. आरती और प्रसाद: देवी की आरती करें और प्रसाद बांटें. देवी कात्यायनी के मंत्र कंचनाभा वराभयं पद्मधरां मुकटोज्जवलां। स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनी नमोस्तुते।। कात्यायनी महामाये, महायोगिन्यधीश्वरी। नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नमः।। देवी चंद्रघंटा के मंत्र या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। ऐं श्रीं शक्तयै नम: (बीज मंत्र) पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।। पहला दिन (मां शैलपुत्री) - नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इन्हें गाय के घी से बने व्यंजन अर्पित करना शुभ माना जाता है। आप मां को शुद्ध घी, घी और चीनी से बनी पंजीरी या ऋतु फल अर्पित कर सकते हैं। दूसरा दिन (मां ब्रह्मचारिणी) - दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है। इन्हें मिश्री और पंचामृत का भोग लगाना उत्तम माना गया है। ऐसे में आप मां को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और चीनी का मिश्रण) अर्पित कर सकते हैं। तीसरा दिन (मां चंद्रघंटा) - मां चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी मिठाई जैसे - खीर या बर्फी का भोग लगा सकते हैं। चौथा दिन (मां कूष्मांडा) - मां कूष्मांडा को मालपुआ का भोग अति प्रिय है। आप उन्हें हलवा या दही-बड़े भी अर्पित कर सकते हैं। पांचवा दिन (मां स्कंदमाता) - पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा होती है। इन्हें आप केले या अन्य ऋतु फल अर्पित कर सकते हैं। छठा दिन (मां कात्यायनी) - मां कात्यायनी को शहद का भोग लगाना विशेष फलदायी होता है। ऐसे में आप उन्हें मिठाई में शहद मिलाकर भी अर्पित कर सकते हैं। सातवां दिन (मां कालरात्रि) - मां कालरात्रि को गुड़ का भोग बहुत प्रिय है। ऐसे में आप उन्हें गुड़ से बने प्रसाद जैसे - हलवा या लड्डू अर्पित कर सकते हैं। आठवां दिन (मां महागौरी) - अष्टमी के दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। इन्हें नारियल या नारियल से बनी मिठाई का भोग लगाना शुभ माना जाता है। इस दिन कन्या पूजन का भी विशेष महत्व है और कन्याओं को भोजन कराया जाता है। नौवां दिन (मां सिद्धिदात्री) - नवरात्र के अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। इस दिन मां को हलवा, पूरी, चना और खीर का भोग लगाया जाता है। इसे कन्या पूजन के बाद प्रसाद के रूप में भी बांटा जाता है। उत्पत्ति देवी पार्वती ने महिषासुर नामक राक्षस का नाश करने हेतु देवी कात्यायनी का रूप धारण किया था। यह देवी पार्वती का सर्वाधिक उग्र रूप था। इस रूप में देवी पार्वती को योद्धा देवी के रूप में भी जाना जाता है। नवरात्रि पूजा नवरात्रि उत्सव के छठवें दिवस के अवसर पर देवी कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है। शासनाधीन ग्रह मान्यताओं के अनुसार, देवी कात्यायनी बृहस्पति ग्रह को शासित करती हैं। स्वरूप वर्णन देवी कात्यायनी को विशाल दैवीय सिंह पर आरूढ़ एवं चतुर्भुज रूप में दर्शाया गया है। देवी कात्यायनी अपने बायें हाथों में कमल पुष्प तथा तलवार धारण करती हैं तथा अपने दाहिने हाथों को अभय मुद्रा एवं वरद मुद्रा में रखती हैं। विवरण हिन्दु धर्मग्रन्थों के अनुसार, कालान्तर में देवी पार्वती ने ऋषि कात्यायन की पुत्री के रूप अवतार धारण किया था। ऋषि कात्यायन की पुत्री होने के कारण देवी पार्वती के इस रूप को देवी कात्यायनी के नाम से जाना जाता है। प्रिय पुष्प लाल रँग के पुष्प, विशेषतः गुलाब के पुष्प मन्त्र ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥ प्रार्थना चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥ स्तुति या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ध्यान वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्। सिंहारूढा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्विनीम्॥ स्वर्णवर्णा आज्ञाचक्र स्थिताम् षष्ठम दुर्गा त्रिनेत्राम्। वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥ पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालङ्कार भूषिताम्। मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥ प्रसन्नवदना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्। कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम्॥ स्तोत्र कञ्चनाभां वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां। स्मेरमुखी शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोऽस्तुते॥ पटाम्बर परिधानां नानालङ्कार भूषिताम्। सिंहस्थिताम् पद्महस्तां कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥ परमानन्दमयी देवी परब्रह्म परमात्मा। परमशक्ति, परमभक्ति, कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥ विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता। विश्वाचिन्ता, विश्वातीता कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥ कां बीजा, कां जपानन्दकां बीज जप तोषिते। कां कां बीज जपदासक्ताकां कां सन्तुता॥ कांकारहर्षिणीकां धनदाधनमासना। कां बीज जपकारिणीकां बीज तप मानसा॥ कां कारिणी कां मन्त्रपूजिताकां बीज धारिणी। कां कीं कूंकै कः ठः छः स्वाहारूपिणी॥ कवच कात्यायनौमुख पातु कां स्वाहास्वरूपिणी। ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥ कल्याणी हृदयम् पातु जया भगमालिनी॥ आरती जय जय अम्बे जय कात्यायनी। जय जग माता जग की महारानी॥ बैजनाथ स्थान तुम्हारा। वहावर दाती नाम पुकारा॥ कई नाम है कई धाम है। यह स्थान भी तो सुखधाम है॥ हर मन्दिर में ज्योत तुम्हारी। कही योगेश्वरी महिमा न्यारी॥ हर जगह उत्सव होते रहते। हर मन्दिर में भगत है कहते॥ कत्यानी रक्षक काया की। ग्रन्थि काटे मोह माया की॥ झूठे मोह से छुडाने वाली। अपना नाम जपाने वाली॥ बृहस्पतिवार को पूजा करिये। ध्यान कात्यानी का धरिये॥ हर संकट को दूर करेगी। भण्डारे भरपूर करेगी॥ जो भी माँ को भक्त पुकारे। कात्यायनी सब कष्ट निवारे॥

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