vidhi 2 कूष्मांडा

माँ चन्द्रघण्टा पूजा विधि | Maa Chandraghanta Puja Vidhi

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माँ चन्द्रघण्टा पूजा विधि | Maa Chandraghanta Puja Vidhi

माँ चन्द्रघण्टा पूजा विधि | Devi Chandraghanta Puja Vidhi

॥ नवरात्रि के तीसरे दिन (माँ चन्द्रघण्टा पूजा विधि) ॥

तीसरे दिन माँ चन्द्रघण्टा पूजा-उपासना की आराधना की जाती है । माँ चन्द्रघण्टा को दूध या दूध से बनी मिठाई जैसे - खीर या बर्फी का भोग लगा सकते हैं ।

॥ स्नान और वस्त्र धारण: ॥

ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें.

॥ स्थान की शुद्धि: ॥

पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें.

॥ संकल्प: ॥

देवी से मनोकामना पूर्ति के लिए संकल्प लें.

॥ मूर्ति स्थापना: ॥

मां चंद्रघंटा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें.

॥ गंगाजल स्नान: ॥

मां की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराएं.

॥ सामग्री अर्पित करें: ॥

रोली, चंदन, अक्षत, सिंदूर, धूप, दीप, पुष्प और इत्र अर्पित करें.

॥ भोग लगाएं: ॥

मां को खीर, दूध से बनी मिठाई या शहद का भोग लगाएं.

॥ मंत्र जप: ॥

मां चंद्रघंटा के मंत्रों का जाप करें.

॥ दुर्गा चालीसा/आरती: ॥

दुर्गा चालीसा का पाठ करें और मां चंद्रघंटा की आरती गाएं.

॥ प्रसाद वितरण: ॥

पूजा के बाद प्रसाद परिवारजनों और कन्याओं में वितरित करें.

॥ विवरण ॥

देवी पार्वती के विवाहित स्वरूप को देवी चन्द्रघण्टा के रूप में जाना जाता है । भगवान शिव से विवाह होने के पश्चात् देवी महागौरी ने अपने मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करना आरम्भ कर दिया, जिसके कारण देवी पार्वती को देवी चन्द्रघण्टा के नाम से जाना जाने लगा । मान्यताओं के अनुसार, देवी चन्द्रघण्टा शुक्र ग्रह को शासित करती हैं । देवी चन्द्रघण्टा बाघिन की सवारी करती हैं । देवी चन्द्रघण्टा को दस भुजाओं के साथ दर्शाया गया है । देवी चन्द्रघण्टा अपने चार बायें हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार तथा कमण्डलु धारण करती हैं तथा पाँचवाँ बायाँ हाथ वर मुद्रा में रखती हैं । वह अपने चार दाहिने हाथों में कमल पुष्प, तीर, धनुष तथा जप माला धारण करती हैं तथा पाँचवें दाहिने हाथ को अभय मुद्रा में रखती हैं । देवी पार्वती का यह रूप शान्तिपूर्ण एवं अपने भक्तों का कल्याण करने वाला है । मान्यतानुसार, उनके मस्तक पर विद्यमान चन्द्र-घण्टी की ध्वनि उनके भक्तों की समस्त प्रकार की शक्तियों से रक्षा करती हैं ।

॥ प्रिय पुष्प ॥

चमेली ॥

॥ मन्त्र ॥

ॐ देवी चन्द्रघंटायै नमः ॥

॥ मंत्र ॥

या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।।

॥ मुख्य बीज मंत्र ॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघण्टायै नम: ॥

॥ प्रार्थना ॥

पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता ।
प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥

॥ स्तुति ॥

या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

॥ ध्यानम् ॥

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
सिंहारूढा चन्द्रघण्टा यशस्विनीम् ॥

मणिपुर स्थिताम् तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम् ।
खङ्ग, गदा, त्रिशूल, चापशर, पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम् ॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम् ।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम ॥

प्रफुल्ल वन्दना बिबाधारा कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम् ।
कमनीयां लावण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम् ॥

॥ स्तोत्रम् ॥

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम् ।
अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम् ॥

चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टम् मन्त्र स्वरूपिणीम् ।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम् ॥

नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायिनीम् ।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम् ॥

॥ कवचम् ॥

रहस्यम् शृणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने ।
श्री चन्द्रघण्टास्य कवचम् सर्वसिद्धिदायकम् ॥

बिना न्यासम् बिना विनियोगम् बिना शापोध्दा बिना होमम् ।
स्नानम् शौचादि नास्ति श्रद्धामात्रेण सिद्धिदाम ॥

कुशिष्याम् कुटिलाय वञ्चकाय निन्दकाय च ।
न दातव्यम् न दातव्यम् न दातव्यम् कदाचितम् ॥

॥ आरती ॥

जय माँ चन्द्रघण्टा सुख धाम । पूर्ण कीजो मेरे काम ॥
चन्द्र समाज तू शीतल दाती । चन्द्र तेज किरणों में समाती ॥

मन की मालक मन भाती हो । चन्द्रघण्टा तुम वर दाती हो ॥
सुन्दर भाव को लाने वाली । हर संकट में बचाने वाली ॥

हर बुधवार को तुझे ध्याये । सन्मुख घी की ज्योत जलाये ॥
श्रद्दा सहित तो विनय सुनाये । मूर्ति चन्द्र आकार बनाये ॥

शीश झुका कहे मन की बाता । पूर्ण आस करो जगत दाता ॥
काँचीपुर स्थान तुम्हारा । कर्नाटिका में मान तुम्हारा ॥

नाम तेरा रटूँ महारानी । भक्त की रक्षा करो भवानी ॥

नवरात्रि के चौथे दिन देवी कूष्मांडा की पूजा की जाती है. इस विधि में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें, फिर देवी को गंगाजल या पंचामृत से स्नान कराएं और उन्हें कुमकुम, अक्षत, फूल, फल व मिठाई अर्पित करें. देवी को प्रसन्न करने के लिए 'या देवी सर्वभूतेषु कुष्मांडा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः' और बीज मंत्र 'ऐं ह्रीं देव्यै नमः' का जाप करें. पूजा के अंत में देवी कूष्मांडा की आरती करें. पूजा विधि स्नान और वस्त्र: सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ, विशेष रूप से पीले वस्त्र धारण करें. आसन ग्रहण: एक साफ आसन पर बैठ जाएं और देवी कूष्मांडा का ध्यान करें. स्नान और श्रृंगार: देवी कूष्मांडा को गंगाजल या पंचामृत से स्नान कराएं. अर्पण: देवी को कुमकुम, लाल चंदन, चुनरी, लाल और पीले फूल, फल और मिठाई अर्पित करें. पान, सुपारी और लौंग भी चढ़ा सकते हैं. भोग: देवी कूष्मांडा को दूध से बनी मिठाई या खीर का भोग लगाएं. प्रसाद ग्रहण: भोग लगाने के बाद उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करें. आरती और दान: अंत में देवी कूष्मांडा की आरती करें. मंत्र ध्यान मंत्र: या देवी सर्वभू‍तेषु मां कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ बीज मंत्र: ऐं ह्रीं देव्यै नमः. महत्व देवी कूष्मांडा की पूजा से भक्तों के समस्त रोग-शोक दूर हो जाते हैं. इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है. देवी कूष्मांडा सृष्टि की आदि-स्वरूपा आदिशक्ति हैं, जिन्होंने ब्रह्मांड की रचना की थी. उत्पत्ति देवी सिद्धिदात्री का रूप धारण करने के पश्चात्, ब्रह्माण्ड को ऊर्जा प्रदान करने हेतु देवी पार्वती सूर्य मण्डल के मध्य निवास करने लगीं। इसके पश्चात् से ही देवी को कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। कूष्माण्डा वह देवी हैं, जिनमें सूर्य के अन्दर निवास करने की शक्ति एवं क्षमता है। देवी माता की देह की कान्ति एवं तेज सूर्य के समान दैदीप्यमान है। नवरात्रि पूजा नवरात्रि के चतुर्थ दिवस पर देवी कूष्माण्डा की पूजा-अर्चना की जाती है। शासनाधीन ग्रह मान्यताओं के अनुसार, देवी कूष्माण्डा सूर्य ग्रह को दिशा एवं ऊर्जा प्रदान करती हैं। अतः भगवान सूर्य देवी कूष्माण्डा द्वारा शासित होते हैं। स्वरूप वर्णन देवी सिद्धिदात्री सिंही पर सवार हैं। देवी को अष्टभुजाधारी रूप में दर्शाया गया है। उनके दाहिने हाथों में कमण्डलु, धनुष, बाण एवं कमल तथा बायें हाथों में क्रमशः अमृत कलश, जप माला, गदा एवं चक्र सुशोभित हैं। विवरण देवी कूष्माण्डा की आठ भुजायें हैं, अतः उन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। भक्तों की मान्यता है कि, सिद्धियाँ तथा निधियाँ प्रदान करने की समस्त शक्ति देवी माँ की जप माला में विद्यमान है। यह वर्णित है कि, देवी माता ने अपनी मधुर मुस्कान से सम्पूर्ण संसार की रचना की, जिसे संस्कृत में ब्रह्माण्ड कहा जाता है। देवी माँ को श्वेत कद्दू की बली अति प्रिय है, जिसे कुष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। ब्रह्माण्ड तथा कूष्माण्ड से सम्बन्धित होने के कारण, देवी का यह रूप देवी कूष्माण्डा के नाम से लोकप्रिय हैं। प्रिय पुष्प लाल रँग के पुष्प मन्त्र श्री कूष्माण्डा मन्त्र ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥ प्रार्थना श्री कूष्माण्डा प्रार्थना सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥ स्तुति श्री कूष्माण्डा स्तुति या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ध्यानम् श्री कूष्माण्डा ध्यान मन्त्र वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥ भास्वर भानु निभाम् अनाहत स्थिताम् चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्। कमण्डलु, चाप, बाण, पद्म, सुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥ पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्। मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥ प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्। कोमलाङ्गी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥ स्तोत्रम् श्री कूष्माण्डा स्तोत्र दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्। जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥ जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्। चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥ त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहि दुःख शोक निवारिणीम्। परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥ कवचम् श्री कूष्माण्डा कवच हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्। हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥ कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा, पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम। दिग्विदिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजम् सर्वदावतु॥ आरती कूष्माण्डा जय जग सुखदानी। मुझ पर दया करो महारानी॥ पिङ्गला ज्वालामुखी निराली। शाकम्बरी माँ भोली भाली॥ लाखों नाम निराले तेरे। भक्त कई मतवाले तेरे॥ भीमा पर्वत पर है डेरा। स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥ सबकी सुनती हो जगदम्बे। सुख पहुँचाती हो माँ अम्बे॥ तेरे दर्शन का मैं प्यासा। पूर्ण कर दो मेरी आशा॥ माँ के मन में ममता भारी। क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥ तेरे दर पर किया है डेरा। दूर करो माँ संकट मेरा॥ मेरे कारज पूरे कर दो। मेरे तुम भण्डारे भर दो॥ तेरा दास तुझे ही ध्याये। भक्त तेरे दर शीश झुकाये॥

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